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About Rudraksha

The word rudraksha is derived from two words - rudra (Lord Shiva) and aksha (eyes). There are several versions about the origin of the Rudrakshas, in Hindu Puranas, which provide various stories about the origin of Rudraksha. However, one thing is common in each story that Rudrakshas originated from the eyes of Lord Shiva, after some great penance or some fierce war. 

Being evolved from the eyes of Lord Shiva they are considered very auspicious and possess mystical, healing and divine properties. 

Ancient scriptures, such as ‘Shiva Purana’, ‘Padma Purana’ and ‘Srimad Bhagavad’ mention the greatness and wonderful powers of the Rudraksha.

For thousands of years, they have adorned the bodies of sages and saints leading a fearless life in far-flung frontiers seeking enlightenment and liberation. They have been used since ancient time for increasing the spiritual power, self confidence, courage and for building a positive attitude. 

Wearing and usage of Rudraksha is popular from Prime Minister to the common man due to the positive results gained in terms of good luck, good health, prosperity, success, financial gains and for eradication of evil forces.

These beads are the seeds of the Rudraksha fruit obtained from Rudraksha trees. Around 70% of the Rudraksha trees are found in Indonesia, 25% in Nepal and 5% in India. Besides, they also found in South Eastern Asian Islands of Java, Sumatra, Borneo, Bali, Iran, Java, Timor. 

Rudraksha can have a positive effect on the heart and nervous system, and relieves one from stress, anxiety, depression, and lack of concentration. It is known for its anti ageing effect, and electromagnetic and inductive properties It increases the power of Intuition and create powerful “protection circles” from negativity and remove obstacles along the path to success.

Rudraksha beads are classified on the basis of origin, colour and mainly the “mukhis” they have on the surface. Each bead has a different effect on you, depending on the size and number of mukhis it has. Rudrakshas of different mukhis please different planets.

 

रुद्राक्ष के जन्मदाता भगवान शिवशंकर है रूद्र का अर्थ ही शिव है । प्राचीन काल से भारत के पौराणिक ग्रंथों में रुद्राक्ष का वर्णन व माहात्म्य चला आ रहा है ।अनेक प्राचीन ग्रंथों में इसका वर्णन पाया जाता है और बहुत काल से साधु सन्यासी इसे धारण करते आ रहे हैं ।धार्मिक समाज के लिए रुद्राक्ष नई बात या आश्चर्य नहीं है

शिव सबके हैं शिव की दृष्टि कल्याणमय है,  भक्तों से शीघ्र ही प्रसन्न होने वाले देव हैं इसलिए शिव जी ने कल्याण रूपी फल के रूप में रुद्राक्ष को उत्पन्न किया है ।रुद्राक्ष शिव के शृंगार में प्रमुख है ।रुद्राक्ष के फल को शिव पूजन पद्धति में साक्षात विग्रह के रूप में माना गया है। प्रत्येक वर्ग,धर्म,जाति का व्यक्ति रुद्राक्ष धारण कर सकता है इसमें किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं है एक भिक्षुक भी रुद्राक्ष धारण करता है और शीर्ष राजनेता भी रुद्राक्ष धारण करते हैं।

जिस प्रकार शिव सर्पो को शरीर में लपेटे हुए नाना प्रकार के विभिन्न गणों को संग लिए हलाहल पिए रुद्राक्ष धारण कर निर्विघ्नं बैठे रहते हैं उसी प्रकार साधक भी कंठ में रुद्राक्ष धारण कर इस भवसागर में हर प्रकार के सर्प रूपी प्राणियों के बीच अपने जीवन की अलख जगाए रखता है ।अध्यात्मिक समस्याएं , तंत्र मारण मोहन उच्चाटन इत्यादि जैसे अभिसार कर्मों से साधक को सुरक्षित रखने का कलयुग में यह एकमात्र तरीका है रुद्राक्ष धारण करना ।रुद्राक्ष धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण विभिन्न प्रकार के फल देने वाला एक अद्भुत फल है।

रुद्राक्ष में धारियां होती हैं इन्हीं को रुद्राक्ष का मुख कहा जाता है । पांच मुखी रुद्राक्ष में पांच धारियां होती हैं, 14 मुखी रुद्राक्ष में 14 धारियां पाई जाएंगी ।रुद्राक्ष का उपरी हिस्सा ब्रह्मा है मध्य भाग में शिव निचले  भाग में विष्णु स्थापित है रुद्राक्ष के फल के बीच जो छिद्र है उसे देव मार्ग कहा जाता है । रुद्राक्ष एवं मनुष्य का मस्तिष्क एक जैसे दिखते हैं प्राकृतिक प्रकोप से ज्यादा खतरा नहीं है क्योंकि वह तो कभी कभार होते हैं परंतु मस्तिष्क के अंदर उठने वाले ज्वालामुखी आंधी-तूफान आंतरिक सुनामी लहरें ज्यादा खतरनाक है इन सब आंतरिक प्रकोप के नियंत्रण करने के लिए रुद्राक्ष श्रेष्ठ है

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